अफीम की खेती का बढ़ा दायरा बाराबंकी समेत इन 13 जिलो में रही है

बाराबंकी ,खेत खलिहानअफीम की खेती को लेकर देश में नजर डालें तो उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है

अफीम को लेकर बाराबंकी तो ज्यादा ही जाता है पर इस को लेकर के और भी कई जिले हैं जहां पर उनकी खेती होती है

बाराबंकी सहित 13 जिलों में 96 हेक्टेयर अफीम की खेती की जाती है बाराबंकी, फैज़ाबाद, लखनऊ, रायबरेली, गाज़ीपुर, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर मुख्य जिलों में 416 कस्तकारों खेती करते है

प्रमुख किस्में

जवाहर अफीम-16, जवाहर अफीम-539 एवं जवाहर अफीम-540 आदि

अफीम की खेती को समझते हैं

अफीम पोस्त के पौधे (poppy) से प्राप्त की जाती है। पौधे की ऊंचाई एक मीटर, तना हरा,सरल और स्निग्ध, पत्ते आयताकार, पुष्प सफेद, बैंगनी या रक्तवर्ण, सुंदर कटोरीनुमा एवं चौथाई इंच व्यास वाले आकार में होते हैं। फल, पुष्पों के झड़ने के तुरंत बाद ही लग जाते हैं, जो एक इंच व्यास के अनार के समान होते हैं। ये डोडा कहलाते हैं। बाद में ये अपने आप फट जाते हैं। फल का छिलका पोश्त कहलाता है। सफेद रंग के सूक्ष्म, गोल, मधुर स्निग्ध दाने बीज के रूप में डोडे के अंदर होते हैं, जो आमतौर पर खसखस के नाम से जाने जाते हैं।

अफीम के गुण : यह स्वाद में कड़वी, कसैली, पचने पर कटु तथा गुण में रूखी होती है। इसका मुख्य प्रभाव नाड़ी-संस्थान पर मदकारी (नशा लानेवाला) होता है। यह नींद लानेवाली, वेदना-रोधक, श्वास-केन्द्र की अवसादक, शुक्रस्तम्भक और धातुओं को सुखानेवाली है।

यह भारत में विशेषत: उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम और मध्यप्रदेश में पैदा होती है। पश्चिमोत्तर प्रान्त में इसकी खेती की जाती है।

अफीम की खेती का दाम एक एकड़ पर लगाएं तो 10000 जहां उसके सरकारी भाव बताया जाता है तो चौबीस- पच्चीस हजार वह लोकल मार्केट में अवैध मूल्य और एक लाख से ज्यादा उसकी अंतरराष्ट्रीय मूल्य बताया जाता है

ये तस्वीर की जगह-लखनऊ से 40 किलोमीटर दूर हैदरगढ़